• सरहुल पर्व पर दर्जन भर गांव से हजारों की संख्या में जुटते हैं प्रकृति प्रेमी
• 2 अप्रैल को रुसा के तहत होगी घड़ा में पानी भराई, 3 अप्रैल को पाहन करेंगे विधिवत पूजा अर्चना
• 4 अप्रैल को शहर में निकलेगा भव्य शोभा यात्रा, आकर्षण का केंद्र होगी झांकी
रामगढ़ | संवाददाता
सरहुल एक पारंपरिक त्योहार है जो विशेष तौर पर आदिवासी बहूल इलाकों में होती है। इसे बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है। यह आदिवासी समुदाय के लिए नई उमंग और ऊर्जा का श्रोत है। इस कारण यह राज्य का प्रमुख त्योहार में सूमार है। झारखंड में एक महीने तक अलग – अलग स्थानों पर तिथि निर्धारित कर सरहुल महोत्सव का आयोजन होता है। बुढ़ी जेहरा सरना स्थल पतरातू बस्ती का इतिहास 100 वर्ष पुराना बताया जा रहा है। तब के जमाने में रामलाल पहान, मनपुरन पहान अथवा उनके पूर्वज पूजा-अर्चना कराते थे। तब से लेकर आज तक लगातार सरहूल महोत्सव की परंपरा जारी है। इसके अलावा शहर के पारसोतिया, मरार, हेसला, मुर्राम, पोचरा आदि स्थानों पर भी अलग-अलग तिथि निर्धारित कर सरहुल महोत्सव का आयोजन प्रस्तावित है।
पतरातू बस्ती में प्रस्तावित कार्यक्रम पर एक नजर
रामगढ़ शहर के पतरातू बस्ती स्थित बुढ़ी जेहरा सरना स्थल में 2 अप्रैल को सरना स्थल घड़ा में पानी रखा जाएगा। साथ ही प्रसाद के रुप में पुआ बनाई जाएगी। इसके अगले दिन 3 अप्रैल को मुर्गा बली का आयोजन होगा। साथ ही प्रसाद के रुप में खिचड़ी बनाई जाएगी। साथ ही पहान लगना मुंडा उपवास रखने वाले प्रकृति उपासक महिला-पुरुषों को विधिवत पूजा – अर्चना कराएंगे। अंतिम दिन 4 अप्रैल को आसपास क्षेत्र के मुरार्मकला, गोसा, चेटर, कांकेबार, दुलमी समेत करीब दर्जन भर गांव से हजारों की संख्या में प्रकृति प्रेमी पहुंचेंगे। यहां से सभी पारंपरिक मांदर और गाजे-बाजे के साथ सुभाष चौक तक निकलने वाली भव्य शोभा यात्रा में शामिल होंगे। इस बीच तीन दिनों तक सरना स्थल में लगातार पारंपरिक नृत्य झूमर का आयोजन होगा।
इस बार होगी आकर्षक झांकी
पतरातू बस्ती की ओर से निकाले जाने वाले शोभा यात्रा में इस बार आकर्षक झांकी होगी। कलाकारों की ओर से सरना के साथ प्रकृतिक चित्रण का दृश्य तैयार किया गया है। जिसे 4 अप्रैल को वाहन पर लोड कर शहर में घुमाया जाएगा। वाहन की आकर्षक सज्जा भी की जाएगी। आयोजन समिति के अनुसार शोभा यात्रा का मुख्य आकर्षण का केंद्र झांकी रहेगा।

ऐतिहासिक मान्यता की गवाही देते हैं अंचल के रजिस्टर और नक्शा में दर्ज पतरातू बस्ती सरना स्थल : किशोर मुंडा
बाल्यकाल से पतरातू बस्ती में सरहूल महोत्सव देखते आ रहा हूं। हमारे पूर्वजों के अनुसार बुढी जेहरा सरना स्थल पतरातू बस्ती का ईतिहास 100 वर्षों से भी पुराना हैं। जहां अखड़ा में लगातार विधिवत पूजा अर्चना जारी है। साथ ही आदिवासी समाज के सभी प्रकृति प्रेमी पारंपरिक नृत्य झूमर में भाग लेते हैं। समय के साथ इसकी भव्यता लगातार बढ़ती आ रही है। आने वाले समय में यह और व्यापक रुप लेगा। ऐतिहासिक मान्यता की गवाही अंचल का रजिस्टर और नक्शा में दर्ज सरना स्थल देता है।

पतरातू बस्ती बुढ़ी जेहरा सरना स्थल में ऐतिहासिक होगा सरहूल महोत्सव, जुटेंगे हजारों प्रकृति प्रेमी : गणेश पहान
पतरातू बस्ती में सरहूल महोत्सव का भव्य आयोजन होगा। इसकी तैयारी में सरना समिति के सभी सदस्य जोर-शोर से जुटे हैं। पंडाल निर्माण के साथ अखड़ा स्थल का रंग-रोगन किया जा रहा है। साथ ही शोभा यात्रा के रुट में पड़ने वाले सभी स्थलों को सरना झंडा से पाट दिया गया है। इसके अलावा जगह – जगह होर्डिंग लगाई गई है। पारंपरिक मांदर और गाजे-बाजे के साथ समाज के लोग नाचते-गाते सुभाष चौक जाएंगे। इस बार के कार्यक्रम में आने की हामी राज्य सरकार के मंत्री चमरा लिंडा ने भरी है।
